समय का अंतिम छोर

 समंदर  था  मैं ,

कतरो कतरो में बंट गया हु ,
कुछ मेरे हिस्से के बचे ,
कुछ तेरे पास है बाकी ,
इन्ही कतरो कतरो से ,
फिर समंदर बन गया हूँ | 

शिकायते बहुत है इस जहां से मेरी ,
मेरी सुनवाई अभी बाकी है ,
 मेरी खिड़की से सूरज अब भी झाँकता है,
मेरे हिस्से की चांदनी अभी बाकी है | 

समय की तेरे जरुरत नहीं,
वो तो बहुत है मेरे पास ,
तेरे खैर की खबर मिल जाये ,
तेरी खामोशियां ही काफी है | 

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